Friday, February 27, 2009

पोखर किनारे "

पोखर किनारे , धूप सेंकती .....
पानी में , खुद को , देखती .....
पोखर किनारे .....एक लड़की !!

हाथों से दुपट्टा लहराती ,
कंकड़ उड़ाती ,
दूर तक ...... पानी में
लहरें बनाती ;
अपनी ही पलकों में भींगती ,
कभी मुस्कुराती ,
कभी शर्माती ,
घुँघरू बजाती .... छाम्छामाती ,
रूप कि मारी ....
वो लड़की कुंवारी .....

पोखर किनारे ...

डरते - डरते ,तब, आसपास देखती ,
फिर ,हाँथों से ,
प्रेमी के लिखे ख़त को
.......................पानी में फेंकती .
पोखर किनारे .......एक लड़की !!


- अभिषेक

1 comment:

रश्मि प्रभा... said...

अल्हड उम्र की अल्हड कल्पनाओं को जिया है
इस काव्य में....बहुत ही बढिया