पोखर किनारे , धूप सेंकती .....
पानी में , खुद को , देखती .....
पोखर किनारे .....एक लड़की !!
हाथों से दुपट्टा लहराती ,
कंकड़ उड़ाती ,
दूर तक ...... पानी में
लहरें बनाती ;
अपनी ही पलकों में भींगती ,
कभी मुस्कुराती ,
कभी शर्माती ,
घुँघरू बजाती .... छाम्छामाती ,
रूप कि मारी ....
वो लड़की कुंवारी .....
पोखर किनारे ...
डरते - डरते ,तब, आसपास देखती ,
फिर ,हाँथों से ,
प्रेमी के लिखे ख़त को
.......................पानी में फेंकती .
पोखर किनारे .......एक लड़की !!
- अभिषेक
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1 comment:
अल्हड उम्र की अल्हड कल्पनाओं को जिया है
इस काव्य में....बहुत ही बढिया
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